2015 में इन दिनों बिहार में विधानसभा चुनाव के प्रचार की धूम थी. कयासों का दौर जारी था. इस बीच ग्राउंड रिपोर्ट के लिए मैं भी जिलों का दौरा कर रहा था. कभी बस पर सवार होकर जाता, तो कभी लोकल ट्रेन का सफर. इस बीच सबसे यादगार सफर झंझारपुर से सकरी तक छोटी लाइन की ट्रेन का रहा. लगभग 17 किलोमीटर की दूरी छोटी लाइन की ट्रेन ने दो घंटे में तय किया. इस दौरान शाम हुई, तो ट्रेन में घुप्प अंधेरा छा गया, लेकिन ट्रेन में चहल-पहल कम नहीं थी. हमने जिन परिवारों से बात की थी, उनमें एक ऐसा परिवार था, जो गंगा स्नान के लिए जा रहा था. उसके घर में किसी का निधन हुआ था. द्वादसा के बाद पूरा परिवार गंगा स्नान के सफर पर था. उन लोगों ने जमीनी हकीकत बयान की थी.
झंझारपुर से ट्रेन खुलने के कुछ देर बाद ही वो पुल भी देखने को मिला, जिसको पहले तस्वीरों में देखता था, जहां पर रेल पुल पर वाहन भी दौड़ते हैं, लोग पैदल चलते हैं. जैसे ही ट्रेन आती वाहन रुक जाते. ऐसे ही मेरी भी ट्रेन ने इस पुल को पास किया. पुल के एक छोर से दूसरे छोर पर ट्रेन पहुंची, तो वहां पर वाहनों की लाइन लग गयी थी. पुल क्रास होते ही वाहन पुल पर दौड़ने लगे. मुङो इसका थोड़ा नजारा देखने को मिला, क्योंकि ट्रेन के डिब्बे से ज्यादा नहीं दिख रहा था. हमारे पास ही दो भाई बैठे थे, जो झंझारपुर में पढ़ाई करते थे. वहां हास्टल में रहते थे. गांव जा रहे थे. दोनों के पास कॉपी-किताबों से भरा बैग था. इनके पित झंझारपुर में ही एसडीओ ऑफिस में काम करते हैं, उन्होंने डेरा (घर) भी झंझारपुर में बना रखा था, लेकिन दोनों बच्चों को पढ़ने के लिए हॉस्टल में डाल रखा था, ताकि उनकी पढ़ाई बाधित नहीं हो.
झंझारपुर स्टेशन से सकरी की यात्र कई मामलों में अविस्मरणीय रही. झंझारपुर स्टेशन इस रेलखंड के प्रमुख स्टेशनों में है, लेकिन यहां ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है. स्टेशन के बाहर परंपरागत रूप से नाई जमीन पर अपनी दुकान सजाये बैठे हैं, जहां ईंट पर बैठ कर बाल और दाढ़ी बनायी जाती है. पास में कुछ रिक्शे हैं. स्टेशन परिसर में सब्जी की कुछ दुकानें भी दिख जायेंगी. पूरा गंवई नजारा, लेकिन पास की बाजार में भीड़ रहती है. झंझारपुर को कोसी क्षेत्र का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है, यहां की बाजार देखने से पुरानी लगती है. दूर-दूर से लोग यहां खरीदारी को आते हैं. आवागमन का ज्यादा साधन यहां नहीं है या तो अपनी सवारी या फिर छोटी लाइन की ट्रेन का सफर.
बाढ़ का असर भी इस इलाके पर बहुत जल्दी होता है. जल्दी कोसी और कमला बलान का पानी यहां तबाही मचाना शुरू कर देता है. ट्रेन परिचालन बंद हो जाता है. इस सबसे अलग पिछले विधानसभा चुनाव में माहौल की बात करें, तो मुङो यहीं पर रेल यात्र के दौरान ये लगा था कि माहगंठबंधन की सरकार बन जायेगी. एनडीए गंठबंधन की चर्चा भले ही हो, लेकिन उसकी सरकार बननेवाली नहीं है. इस बात की चर्चा जब मैंने अपने परचितों से की, तो उन्होंने परिहास किया, लेकिन जब परिणाम आया, तो सभी स्तब्ध थे. मुङो अपने अनुमान की पुष्टि होते देख कर अच्छा लग रहा था, क्योंकि जनता का जो मूड था, वो साफ तौर पर दिखायी दे रहा था, लेकिन उसे समझने के लिए कोई तैयार नहीं था.
..जारी.
झंझारपुर से ट्रेन खुलने के कुछ देर बाद ही वो पुल भी देखने को मिला, जिसको पहले तस्वीरों में देखता था, जहां पर रेल पुल पर वाहन भी दौड़ते हैं, लोग पैदल चलते हैं. जैसे ही ट्रेन आती वाहन रुक जाते. ऐसे ही मेरी भी ट्रेन ने इस पुल को पास किया. पुल के एक छोर से दूसरे छोर पर ट्रेन पहुंची, तो वहां पर वाहनों की लाइन लग गयी थी. पुल क्रास होते ही वाहन पुल पर दौड़ने लगे. मुङो इसका थोड़ा नजारा देखने को मिला, क्योंकि ट्रेन के डिब्बे से ज्यादा नहीं दिख रहा था. हमारे पास ही दो भाई बैठे थे, जो झंझारपुर में पढ़ाई करते थे. वहां हास्टल में रहते थे. गांव जा रहे थे. दोनों के पास कॉपी-किताबों से भरा बैग था. इनके पित झंझारपुर में ही एसडीओ ऑफिस में काम करते हैं, उन्होंने डेरा (घर) भी झंझारपुर में बना रखा था, लेकिन दोनों बच्चों को पढ़ने के लिए हॉस्टल में डाल रखा था, ताकि उनकी पढ़ाई बाधित नहीं हो.
झंझारपुर स्टेशन से सकरी की यात्र कई मामलों में अविस्मरणीय रही. झंझारपुर स्टेशन इस रेलखंड के प्रमुख स्टेशनों में है, लेकिन यहां ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है. स्टेशन के बाहर परंपरागत रूप से नाई जमीन पर अपनी दुकान सजाये बैठे हैं, जहां ईंट पर बैठ कर बाल और दाढ़ी बनायी जाती है. पास में कुछ रिक्शे हैं. स्टेशन परिसर में सब्जी की कुछ दुकानें भी दिख जायेंगी. पूरा गंवई नजारा, लेकिन पास की बाजार में भीड़ रहती है. झंझारपुर को कोसी क्षेत्र का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है, यहां की बाजार देखने से पुरानी लगती है. दूर-दूर से लोग यहां खरीदारी को आते हैं. आवागमन का ज्यादा साधन यहां नहीं है या तो अपनी सवारी या फिर छोटी लाइन की ट्रेन का सफर.
बाढ़ का असर भी इस इलाके पर बहुत जल्दी होता है. जल्दी कोसी और कमला बलान का पानी यहां तबाही मचाना शुरू कर देता है. ट्रेन परिचालन बंद हो जाता है. इस सबसे अलग पिछले विधानसभा चुनाव में माहौल की बात करें, तो मुङो यहीं पर रेल यात्र के दौरान ये लगा था कि माहगंठबंधन की सरकार बन जायेगी. एनडीए गंठबंधन की चर्चा भले ही हो, लेकिन उसकी सरकार बननेवाली नहीं है. इस बात की चर्चा जब मैंने अपने परचितों से की, तो उन्होंने परिहास किया, लेकिन जब परिणाम आया, तो सभी स्तब्ध थे. मुङो अपने अनुमान की पुष्टि होते देख कर अच्छा लग रहा था, क्योंकि जनता का जो मूड था, वो साफ तौर पर दिखायी दे रहा था, लेकिन उसे समझने के लिए कोई तैयार नहीं था.
..जारी.
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