उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं, जिसको लेकर पिछले कुछ महीनों से गहमा-गहमी है. सत्ताधारी समाजवादी पार्टी में परिवार का मनमुटाव सड़क पर आ गया है, जिसके किस्से आम हैं. इसमें राजनीति भी देखी जा रही है, कैसे और किस पर सरकार की नकामी का दोष मढ़ें, ये भी बात हो रही है. कहा जा रहा है कि फेस सेविंग की तरकीब निकाली गयी है. अंदरखाने में सब ठीक है. क्या है, ये कह पाना मुश्किल लगता है, लेकिन जो बात मैं कहना चाहता हूं. वो साफ और स्पष्ट है, जिससे बहुत से लोग सहमत व असहमत हो सकते हैं, लेकिन ये मेरा मत है.
उत्तर प्रदेश की स्थितियों को देखते हुये मुङो लगता है कि भाजपा अभी तक मजबूत दिख रही है, लेकिन कांग्रेस की ओर से भी लगातार प्रयास किये जा रहे हैं. खाट सभा की भले ही आलोचना हुई हो, लेकिन इससे पार्टी चर्चा में आयी है. हालांकि गन्ने की फैक्ट्री लगाने के राहुल गांधी के बयान ने पार्टी की साख को बट्टा जरूर लगाया गया है, लेकिन इससे निगेटिव प्रचार पार्टी को मिला है. कांग्रेस लोगों के बीच में चर्चा का विषय बन रही है, जो दल उत्तर प्रदेश में लगभग तीन दशक से सत्ता से दूर है. उसके विधायकों की संख्या दहाई से शुरुआती अकड़ों तक ही पहुंच पाती हैं. वो चर्चा में रहे, तो ये उसके नेताओं को लिए अच्छी बात है, हालांकि उत्तर प्रदेश को लेकर क्या विजन कांग्रेस का है, इसको स्पष्ट तौर पर बताना होगा. पार्टी की ओर से संगठन में जिस तरह के बदलाव किये गये हैं और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जिस तरह से चेहरा बनाया गया है, वो वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम भर लगता है, क्योंकि ये कांग्रेस के नीति निर्माता भी जानते हैं कि उन्हें अपने दम पर सत्ता नहीं मिलनेवाली है.
सवाल ये है कि अगर कांग्रेस मजबूत होगी, तो नुकसान किसको होगा. इसका सीधा और साफ उत्तर है कि इससे सबसे ज्यादा असर भाजपा पर पड़ेगा, जो लोकसभा वाली सफलता यूपी में दोहराने की चाहत रखती है, हालांकि ये होता नहीं दिख रहा है, लेकिन जो अभी से देखने को मिल रहा है, उससे साफ लगता है कि भाजपा अन्य दलों से आगे रहेगी. इसके संकेत हाल में आये सव्रे में मिले हैं, जिनमें भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया गया है.
इसे इस तरह से कह सकते हैं कि 2014 में भाजपा को समाज के सभी वर्गो का वोट मिला था, जिससे उसने उम्मीद से भी ज्यादा सीटें हासिल की थीं. यूपी ने ही उसे केंद्र में स्पष्ट बहुमत दिलाया था. नहीं तो कहा जा रहा था कि बिना समर्थन भाजपा अपने दम पर सरकार नहीं बना पायेगी, लेकिन यूपी के नतीजों ने सभी सव्रे को फेल कर दिया था.
यूपी की सत्ता के और दो दावेदारों में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी हैं. दोनों का अपना वोट बैंक है. इन्हें वो वोट मिलने ही हैं, लेकिन केवल अपने वोट बैंक से दोनों दलों का काम नहीं चलेगा. ऐसे में इन्हें किसी न किसी स्तर पर अपने वोट बैंक से हट कर भी वोट चाहिये होगा. उसका इंतजाम ये पार्टियां किस तरह से कर पाती हैं, यही सबसे दिलचस्प है, क्योंकि इन्हें मालूम है कि जिनके वोट इन्हें चाहिये, वो अब झांसे में आनेवाले नहीं हैं. दोनों ही दलों ने इन वोटों के सहारे पिछले दस सालों में सत्ता का सुख ले चुके हैं. समाजवादी पार्टी अभी सत्ता में है ही.
2007 के चुनाव की ओर आपको ले जाना चाहेंगे, तब बसपा को बहुमत मिला था. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह राजभवन में त्यागपत्र देकर निकले थे. राजभवन के बाहर पत्रकारों ने उनसे हार की वजह पूछी थी, तो उन्होंने कहा था कि हम कहां हारे हैं, हार तो भाजपा की हुई है. हमारे तो वोट बढ़ गये हैं. अगर भाजपा को उसके वोट मिल जाते, तो आज हम फिर से सत्ता में होते, तब मुलायम सिंह का संदेश बिल्कुल स्पष्ट था. उसी संदेश के सहारे 2012 के चुनाव में बसपा से भी बड़ा बहुमत समाजवादी पार्टी को अकेले मिला था, लेकिन 2014 आते-आते स्थिति ऐसी बदली कि प्रदेश की सत्ता से कोसों दूर रहनेवाली भाजपा केंद्र की सत्ता में यूपी के सहारे पूरे बहुमत के साथ आयी.
अब 2017 की तैयारी में कांग्रेस जितना आगे बढ़ेगी, भाजपा को उतना ही नुकसान होगा, क्योंकि दोनों का वोट बैंक एक है और अगर कांग्रेस वोट काटती है, तो भाजपा की सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की लालसा पर ब्रेक लग सकता है.
उत्तर प्रदेश की स्थितियों को देखते हुये मुङो लगता है कि भाजपा अभी तक मजबूत दिख रही है, लेकिन कांग्रेस की ओर से भी लगातार प्रयास किये जा रहे हैं. खाट सभा की भले ही आलोचना हुई हो, लेकिन इससे पार्टी चर्चा में आयी है. हालांकि गन्ने की फैक्ट्री लगाने के राहुल गांधी के बयान ने पार्टी की साख को बट्टा जरूर लगाया गया है, लेकिन इससे निगेटिव प्रचार पार्टी को मिला है. कांग्रेस लोगों के बीच में चर्चा का विषय बन रही है, जो दल उत्तर प्रदेश में लगभग तीन दशक से सत्ता से दूर है. उसके विधायकों की संख्या दहाई से शुरुआती अकड़ों तक ही पहुंच पाती हैं. वो चर्चा में रहे, तो ये उसके नेताओं को लिए अच्छी बात है, हालांकि उत्तर प्रदेश को लेकर क्या विजन कांग्रेस का है, इसको स्पष्ट तौर पर बताना होगा. पार्टी की ओर से संगठन में जिस तरह के बदलाव किये गये हैं और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जिस तरह से चेहरा बनाया गया है, वो वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम भर लगता है, क्योंकि ये कांग्रेस के नीति निर्माता भी जानते हैं कि उन्हें अपने दम पर सत्ता नहीं मिलनेवाली है.
सवाल ये है कि अगर कांग्रेस मजबूत होगी, तो नुकसान किसको होगा. इसका सीधा और साफ उत्तर है कि इससे सबसे ज्यादा असर भाजपा पर पड़ेगा, जो लोकसभा वाली सफलता यूपी में दोहराने की चाहत रखती है, हालांकि ये होता नहीं दिख रहा है, लेकिन जो अभी से देखने को मिल रहा है, उससे साफ लगता है कि भाजपा अन्य दलों से आगे रहेगी. इसके संकेत हाल में आये सव्रे में मिले हैं, जिनमें भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया गया है.
इसे इस तरह से कह सकते हैं कि 2014 में भाजपा को समाज के सभी वर्गो का वोट मिला था, जिससे उसने उम्मीद से भी ज्यादा सीटें हासिल की थीं. यूपी ने ही उसे केंद्र में स्पष्ट बहुमत दिलाया था. नहीं तो कहा जा रहा था कि बिना समर्थन भाजपा अपने दम पर सरकार नहीं बना पायेगी, लेकिन यूपी के नतीजों ने सभी सव्रे को फेल कर दिया था.
यूपी की सत्ता के और दो दावेदारों में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी हैं. दोनों का अपना वोट बैंक है. इन्हें वो वोट मिलने ही हैं, लेकिन केवल अपने वोट बैंक से दोनों दलों का काम नहीं चलेगा. ऐसे में इन्हें किसी न किसी स्तर पर अपने वोट बैंक से हट कर भी वोट चाहिये होगा. उसका इंतजाम ये पार्टियां किस तरह से कर पाती हैं, यही सबसे दिलचस्प है, क्योंकि इन्हें मालूम है कि जिनके वोट इन्हें चाहिये, वो अब झांसे में आनेवाले नहीं हैं. दोनों ही दलों ने इन वोटों के सहारे पिछले दस सालों में सत्ता का सुख ले चुके हैं. समाजवादी पार्टी अभी सत्ता में है ही.
2007 के चुनाव की ओर आपको ले जाना चाहेंगे, तब बसपा को बहुमत मिला था. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह राजभवन में त्यागपत्र देकर निकले थे. राजभवन के बाहर पत्रकारों ने उनसे हार की वजह पूछी थी, तो उन्होंने कहा था कि हम कहां हारे हैं, हार तो भाजपा की हुई है. हमारे तो वोट बढ़ गये हैं. अगर भाजपा को उसके वोट मिल जाते, तो आज हम फिर से सत्ता में होते, तब मुलायम सिंह का संदेश बिल्कुल स्पष्ट था. उसी संदेश के सहारे 2012 के चुनाव में बसपा से भी बड़ा बहुमत समाजवादी पार्टी को अकेले मिला था, लेकिन 2014 आते-आते स्थिति ऐसी बदली कि प्रदेश की सत्ता से कोसों दूर रहनेवाली भाजपा केंद्र की सत्ता में यूपी के सहारे पूरे बहुमत के साथ आयी.
अब 2017 की तैयारी में कांग्रेस जितना आगे बढ़ेगी, भाजपा को उतना ही नुकसान होगा, क्योंकि दोनों का वोट बैंक एक है और अगर कांग्रेस वोट काटती है, तो भाजपा की सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की लालसा पर ब्रेक लग सकता है.
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