रविवार, 21 मई 2017

फेसबुक-ह्वाट्सएप से नहीं, पढ़ने से आयेगी शायरी

विश्व प्रसिद्ध शायर व गजलकार डॉ नवाज देवबंदी मुजफ्फरपुर आये थे. इस दौरान उन्होंने साहित्य, समाज व राजनीति को लेकर बात की. उन्होंने कहा कि अंतरआत्मा की आवाज पर जो शायरी होती है, वो दीर्घायु होती है. डॉ नवाज देवबंदी से हुई विस्तृत बातचीत के कुछ अंश.
प्रश्न. आज के समाज और साहित्य को कैसे देखते हैं?
उत्तर. राजनीति के रास्ते से साहित्यकार कभी बड़ा नहीं हो सकता. साहित्य का पथ राजनीति के पथ से बहुत बड़ा है. मैं समझता हू साहित्य साधना से बड़ा बना जा सकता है. मैं एक बात कहता हूं, इनकार करने का अपना मजा है, जो इसके मजे को जान जाते हैं, जिंदगी वही जीते हैं. पद के लालच में अत्मसम्मान को दांव पर नहीं लगाना चाहिये, क्योंकि पद हमेशा आदमी को सम्मानित नहीं करते हैं. जिसको सम्मान और आत्मसम्मान कहा जाता है, वो समाज से मिलता है, जो लोग लालची होते हैं. उनके लिए इतिहास के पन्ने कभी सुरक्षित नहीं होते हैं. इतिहास उन्हें ही याद करता है, जिन्होंने बगैर किसी लालच के समाज और देश की सेवा की है.  मेरा एक शेर है.
बादशाहों का इंतजार करें.
इतनी फुरसत कहां फकीरों को.
प्रश्न. आज के दौर में शायरी के क्या मायने हैं?
उत्तर. शायरी एक साधना है और वो मनन चाहती है. जब भी इसमें स्वार्थ की एक भी बूंद पड़ जायेगी, तो ये साधना भंग हो जायेगी. शायरी को इस नजरिये से करता है कि फलां समाज व फला मंच पर पसंद की जायेगी, तो मैं उसे बेइमान मानता हूं. अंतरआत्मा की आवाज पर जो शायरी होती है. उसकी उम्र बहुत बड़ी होती है. दूसरी बात ये है कि शायरी का कमाल ये है कि वो हर धर्म और जाति, हर इलाके व देश के लोगों को प्रभावित करती है. हमारी बदनसीबी है कि कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी खास इलाके में जा रहे हैं, तो वहां के लिए कुछ अलग शेर कहते हैं. किसी देश में जा रहे हैं, तो कुछ और कहते हैं. वो किसी खास धर्म या संप्रदाय के मुशायरे में जा रहे हैं, तो कुछ और शेर सुनाते हैं. हम मानते हैं कि जहां, अलग-अलग शेर कहने पड़ें, उसको शायरी नहीं कहते. शायरी तो ऐसी है कि धार्मिक ग्रंथों की वाणी जैसी होती है, जिसे सब लोग पसंद करते हैं.
प्रश्न. बड़े पैमाने पर नयी शायरी करनेवाले आ रहे हैं?
उत्तर. हम एक उदारण से अपनी बात कहना चाहते हैं, ये जो ताजमहल है, जिसे सारी दुनिया देखने आती है. ये इमारत का कमाल नहीं है. ये शाहजहां और मुमताज के बीच जो मोहब्बत थी, उसका कमाल है. शायरी का भी ऐसा ही है. लोग नयी-नयी इमारतें बना कर ये चाहते हैं कि वो शाहजहां बन जाये, लेकिन वो ऐसा कभी नहीं कर पायेंगे. आप तो अभी पेड़ों की बात कर रहे थे. ये लोग जो भावनाओं को उत्तेजित करनेवाली शायरी सुनाते हैं. ये बिल्कुल यूकेलिस्पटस और पापुलर के पेड़ जैसे हैं. अगर शीशम बनना है, तो इसके लिए एक उम्र चाहिये. अभ्यास चाहिये. इसके लिए भावना और साधना चाहिये. फिर देखिये कैसी शायरी होती है. उसकी क्या कीमत होती है. नयी पीढ़ी यूकेलिस्पटस की तरह बहुत जल्दी अपने आप को ऊंचा उठाना चाहती है, लेकिन ये भूल जाती है कि जमीन में उसकी जड़ नहीं है. हल्की सी हवा और पानी उसे उखाड़ देती है. हमारी नयी नस्ल को शायरी करनी है, तो साधना और इबादत की तरह करनी होगी.
प्रश्न. बजारवाद के दौर में शायरी के सामने क्या कोई संकट देखते हैं?
उत्तर. देखिये, शायरी और कविता समाज का आइना है. जो कुछ समाज में घट रहा है. उसे ये आइना देख रहा है. आपको एक बात बताता हूं, आज के मौजूदा समाज में इतना खराब घट रहा है. कभी-कभी ये शीशा खुद-ब-खुद चटक जाता है. इसमें दरारें पड़ जाती हैं. मैं समझता हूं कि शीशे और आइने की अपनी जिम्मेवारी है. अगर उसे रचनाकार महसूस करे, तो उसकी बहुत जिम्मेवारी है. यही काफी नहीं है कि हम सिर्फ इश्क और मोहब्बत की बात करें. हालांकि गजल का मतलब अपने महबूब से बात करना है. ये अलग बात है कि इस पैग के अंदर ही कोई अच्छी बात की जाये, लेकिन गजल ने अपनी भौगोलिक सीमाएं बहुत बढ़ायी है. आज आप देखते होंगे, सिर्फ प्यार, मोहब्बत व इश्क, इनसे हट कर भी टूटते-बिखरते रिश्तों पर बहुत शायरी हो रही है. भूख-प्यास, नाइंसाफी, सामाकि और राजनीतिक मुद्दों पर बहुत शायरी हो रही है, लेकिन इसके लिए जिस संयम की जरूरत है, वो बहुत कम लोगों के पास है. शायरी विरोध तो हो सकती है, लेकिन गाली नहीं. आज स्टेज पर लोग संयम नहीं रख पाते हैं. मेरा एक शेर है-
देने को तो मैं भी उसे दे सकता हूं गाली.
लेकिन मेरी तहजीब इजाजत नहीं देती.
प्रश्न. आनेवाले वक्त में शायरी को लेकर क्या कोई चिंता है?
उत्तर. देखिये, सबसे बड़ा बदलाव ये आ रहा है कि जो हमारी नयी पीढ़ी, मुशायरे, कवि सम्मेलन, कविता व शायरी में आ रही है. वो बोनलेस है. इससे हमारा मकसद , ये पढ़ कर नहीं आ रही है. ये ह्वाट्सएप और इंटरनेट से आ रही है. अगर शायरी करनी है, तो उसे मीर, गालिब, जिगर, फिराक, हाफिज और नासिर को पढ़ना पड़ेगा, जो लोग पढ़ कर आयेंगे, उनकी बुनियाद मजबूत होगी, लेकिन अभी बैगर नींव की इमारत बनायी जा रही है. सभ्यता और तहजीब अब मंचों से रुकसत हो रही है. हम एक वाकया बताना चाहते हैं, आपके आयोजन में शामिल होने के लिए जब मैं दिल्ली से आ रहा था, तो एयरपोर्ट पर आलोक से मुलाकात हुई, जो आनेवाली पीढ़ी के प्रतिनिधि शायर हैं. हवाई अड्डे पर बड़ी भीड़ थी. वहां जब आलोक श्रीवास्तव हमारे पैर छूने के लिए झुक रहे थे, तो मैं समझ रहा था कि हिन्दुस्तान बड़ा हो रहा है. हमारी परंपरा बड़ी हो रही है. हमारी सभ्यता और कल्चर बड़ा हो रही है.






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